पौराणिक कथा :- चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी !

पौराणिक कथा :- चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी ! 

Poranik katha :- chakravarthy Samrat Raja Bharat .

पौराणिक कथा :- चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी
पौराणिक कथा :- चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी

प्रिय पाठकों 

पौराणिक प्रेम कथाओं की सीरीज में आज की कहानी हैं "पौराणिक कथा :- चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी ! " पौराणिक प्रेम कथाएं भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और वे हमारी संस्कृति, नैतिकता और राष्ट्रीय धार्मिक भावनाओं को प्रतिष्ठित करती हैं। इन पौराणिक प्रेम कथाओं का इतिहास बहुत पुराना है और इन्हें लोग पीढ़ी से पीढ़ी तक आदि रचनाओं और पौराणिक कथाओं के रूप में पढ़ते आए हैं। इन कथाओं में प्रेम के विभिन्न पहलुओं, रोमांचक घटनाओं, नायिकाओं और नायकों के चरित्र विकास के माध्यम से विभिन्न संदेश और सिद्धांतों की प्रस्तुति की गई है।

जिसमें से कुछ प्रसिद्ध पौराणिक प्रेम कथाएं जिसे आप यहां "पौराणिक कथाओं का महा संग्रह" से पढ़ सकते हैं। इसमें सभी प्रमुख पौराणिक प्रेम कथाओं के उल्लेख की सूची हैं। इसके अलावा भी बहुत सारी प्रेम कथाएं हैं जो भारतीय पौराणिक साहित्य में प्रसिद्ध हैं। ये कथाएं विभिन्न पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में प्राप्त होती हैं और अलग-अलग प्रेम कहानियों को आधार बनाती हैं। तो चलिए शुरू करते हैं आज की प्रेम कथा।

पौराणिक कथा :- चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी


Poranik katha :- chakravarthy Samrat Raja Bharat.

चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की कहानी:-

महाभारत भरत वंश की कोई सीधी-साधी युद्ध कथा नहीं है। यह कथा भारतीय संस्कृति के उतार-चढ़ाव की है। ये कथा है सत्य और असत्य के महायुद्ध की यह कथा है अंधेरे से जूझने वाले उजाले की। यह कहानी वास्तव में उस दिन शुरू नहीं हुई  जिस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था या जिस दिन द्रोपदी ने दुर्योधन का मजाक उड़ाया था।यह कहानी इन घटनाओं से बहुत पहले ही प्रारंभ हो चुकी थी जो राजा भरत की कहानी हिंदी महाकाव्य "महाभारत" के माध्यम से प्रस्तुत होती है। राजा भरत की कहानी भारतीय पुराणों और महाभारत महाकाव्य के अनुसार प्रसिद्ध है। यह कथा राजा भरत के जीवन की उत्कृष्टता, न्यायप्रियता, त्याग और निष्ठा को दर्शाती है। यह कहानी द्वापर युग में भारत वंश के राजा भरत के जीवन को वर्णित करती है। राजा भरत, राजा दुष्यंत और रानी शकुंतला के पुत्र थे।


भरत की जन्म से पहले ही उनके पिता राजा दुष्यंत को राजमहल के एक वन में रानी शकुंतला से मिलना पड़ा। वहां उन्होंने उनकी प्रेम कहानी सुनी, जिससे वह उन्हें प्रेम में पड़ गए। यथार्थ में विवाह के बाद रानी शकुंतला गर्भवती थी, लेकिन राजा दुष्यंत को वन में वापस जाना पड़ा। जब शकुंतला गर्भवती थी, तब वह राजमहल में अकेली थी और उसे राजा दुष्यंत ने भूल गए। उसके बाद उन्होंने बिना प्रेमिका के शकुंतला को वापस भेज दिया। शकुंतला ने अपने पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम भरत रखा गया।और उसी भरत के नाम से हमारे देश का नाम भारत पड़ा।


कुरूवंश की शुरुआत:-

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से अत्रि , अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरु हुए। पुरुवंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए कुरूवंश भारतीय महाकाव्य महाभारत का महत्वपूर्ण वंश है। यह वंश कुरु राजा के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है। महाभारत के अनुसार, कुरुवंश की शुरुआत राजा शांतनु और उनकी पत्नी गंगा के पुत्र भीष्म से हुई। भीष्म ने गंगा माता के वचन पर ब्रह्मचारी व्रत अपनाया था, इसलिए उन्होंने स्वयंसिद्ध न करते हुए कुरु राजवंश का पालन किया और उसे विकासित किया।


भीष्म के बाद उनके पुत्र धृतराष्ट्र और पांडु ने कुरुवंश का शासन संभाला। धृतराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन महाभारत में कौरवों के नेता के रूप में प्रस्तुत होता है, जबकि पांडु के पांडव बंधुओं को पांडवों के रूप में जाना जाता है।महाभारत का मुख्य कथानक इस कुरुवंश पर केंद्रित है, जहां पांडव और कौरव बंधुओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में कुरुवंश का अंत हो गया और महाभारत युद्ध के बाद भारतीय समाज की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।


दुष्यंत और शकुंतला का विवाह:-

दुष्यंत और शकुंतला की कथा को महाकवि कालिदास ने अपने महानाटक "अभिज्ञानशाकुंतलम्" में वर्णित किया है। यह कथा भारतीय साहित्य की मशहूर प्रेम कथाओं में से एक मानी जाती है। कथा के अनुसार, राजा दुष्यंत, पुरुषोत्तम नामक एक महान राजा,थे। एक बार राजा दुष्यंत शिकार की तलाश में वन में गए थे। शिकार का पीछा करते हुए वे ऋषि कण्व के आश्रम में पहुंच गये। आश्रम में शकुंतला को देखकर वह उस पर मोहित हो गए।दुष्यंत, शकुंतला को देख कर उस पर इतना मोहित हो गये कि उन्होंने आश्रम में ही शकुंतला से गंधर्व विवाह कर लिया।शकुंतला से विवाह के पश्चात वे कुछ कुछ समय तक आश्रम में ही रहे। अब दुष्यंत के अब दुष्यंत के वापस जाने का समय आ गया था लेकिन उस समय ऋषि कण्व वहां उपस्थित नहीं थे इसलिए वे शकुंतला को अपने साथ नहीं ले जा सके। उन्होंने विवाह की निशानी के रूप में शकुंतला को अपनी अंगूठी निकालकर पहना दी और वहां से चले गये।


शकुंतला को दुर्वासा ऋषि ने श्राप क्यों दिया:- 

कथा के अनुसार, शकुंतला अपने मातृआश्रम में बड़ी हुई थी और दुष्यंत उसे राजमहल में ले गए थे। शकुंतला अपने पति के अभाव में ध्यानविहीन हो गई और ध्यान में अनित्य वस्तुओं में लग गईं। एक बार शकुंतला अपने सखियों संग बैठी दुष्यंत के बारे में सोच रही थी। उसी समय दुर्वासा ऋषि आश्रम में पहुंच गये। शकुंतला दुष्यंत की याद में इतनी खोई हुई थी कि जब ऋषि दुर्वासा आश्रम में पहुंचे तो शकुंतला को पता ही नहीं चला जिसके कारण शकुंतला ऋषि दुर्वासा का आदर सत्कार नहीं किया जिससे ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गये और शकुंतला को श्राप दे दिया कि किसकी याद में तो इतना खोई हुई है कि तूने मेरा सम्मान नहीं किया वह तुझे भूल जायेगा।

 

दुर्वासा – एक मुनि जो शंकर के अंश से उत्पन्न अनुसूया और अत्रि के पुत्र थे. ये अत्यंत क्रोधी थे। शकुंतला की सखियों ने क्रोधित ऋषि से अनजाने में उससे हुए अपराध के लिए क्षमा करने का निवेदन किया। ऋषि ने कहा- मेरे श्राप का प्रभाव तो समाप्त नहीं हो सकता किंतु दुष्यंत और शकुंतला को जो अंगूठी दी हुई है उसको दिखाने से दुष्यंत को सारी घटना स्मरण हो जाएगी। इस प्रकार, कण्व ऋषि के श्राप के कारण, शकुंतला को अपने पति की पहचान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उसे अपने पति को अपनी पुनर्मिलन की प्रतीक्षा करनी पड़ी।


शकुंतला का महल की ओर प्रस्थान:-

ऋषि कण्व जब आश्रम आये तो उनको शकुंतला के विवाह एवं सारी घटना का समाचार मिला। उन्होंने एक गृहस्थ एवं पिता की तरह शकुंतला को अपने पति के पास जाने के लिए विदा किया। शकुंतला महल के लिए चल पड़ी। उसे एक नदी पार करनी थी नदिया पार करते समय अनायास ही शकुंतला के हाथ से अंगूठी पानी में गिर गई और एक मछली ने उसे निगल लिया। शकुंतला इन सारी घटना से अनजान थी। श्राप के प्रभाव में राजा दुष्यंत अपनी विवाह की सारी घटना भूल गये थे। शकुंतला के पास राजा द्वारा दी गई अंगूठी नहीं थी इसलिए दुष्यंत शकुंतला को पहचान नहीं सके। निराश शकुंतला को उनकी मां मेनका अप्सरा ने कश्यप ऋषि के पास भेज दिया। उस समय वह गर्भवती थी समय अनुसार शकुंतला ने एक अत्यंत सुंदर और साहसी बालक भरत को जन्म दिया।


शकुंतला की खोज:-

कुछ समय पश्चात समय का चक्र ऐसा चला की दुष्यंत को वह अंगूठी मिल गयी जो उसने शकुंतला को विवाह की निशानी के रूप में दी थी । अंगूठी को देखते ही उसे सारी घटना का स्मरण हो गया । उसने शकुंतला को खोजना प्रारंभ किया एक दिन वह शकुंतला को खोजते हुए ऋषि कश्यप के आश्रम में पहुंच गए वहां शकुंतला रहती थी । राजा ने वहां भरत को शेर के बच्चों के साथ खेलते हुए देखा । दुष्यंत ने ऐसे साहसी बालक को कभी नहीं देखा था। दुष्यंत ने बालक को उसका परिचय पूछा तो भरत में अपनी और अपनी मां का नाम बता दिया । दुष्यंत और भारत के बीच बातचीत हो रही थी उसी समय आकाशवाणी हुई कि दुष्यंत यह तुम्हारा ही पुत्र है इसका भरण-पोषण करो । दुष्यंत में आकाशवाणी सुनते ही भरत को अपने गले से लगा लिया और शकुंतला के पास चले गये। दुष्यंत अपने पुत्र भरत एवं शकुंतला के साथ हस्तिनापुर वापस लौट आए । हस्तिनापुर में भरत की शिक्षा-दीक्षा हुई । राजा दुष्यंत ने अपने पुत्र को विविध क्षेत्रों में शिक्षा दी। महारानी शकुंतला ने उसे अपने प्यार के साथ अच्छे संस्कार दिए ।

 

चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत:-

राजा दुष्यंत के बाद भरत राजा बने । उन्होंने अपने राज्य की सीमा का विस्तार संपूर्ण आर्यावर्त में किया । उन्होंने अपने जीवन काल में यमुना, सरस्वती तथा गंगा के तटों पर क्रमशः सौ, तीन सौ तथा चार सौ  अश्वमेध यज्ञ किये एवं चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि प्राप्त की ।

 

राजा भरत का विवाह:-

राजा भरत का विवाह विदर्भराज के तीन कन्याओं से हुआ । जिनसे उन्हें नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई । उनका मानना था कि राजा के केवल तीन कर्तव्य होते हैं देश और जन समुदाय को न्याय देना उनकी रक्षा करना और ऐसे व्यक्ति को युवराज नियुक्त करना जो देश और प्रजा को न्याय दे सके एवं उनकी रक्षा कर सके ।

 

महाभारत की रणभूमि का सृजन:-

उनका मानना था कि मेरे नौ पुत्रों में ऐसे कोई भी गुण दिखाई नहीं देते इसलिए वे अपने पुत्रों में से किसी को युवराज नियुक्त नहीं करते । उन्होंने भारद्वाज भुमन्यु को अपना पुत्र मानकर युवराज नियुक्त किया । परंतु भारत की राजनीति की धरती पर जो लोकतंत्र का अंकुर फूटा था । वह कुछ पीढ़ियों बाद हस्तिनापुर नरेश शांतनु के शासनकाल में मुरझा गया जब जन्म को कर्म से बड़ा माना गया वर्तमान को एक अनजाने भविष्य के दांव पर लगा दिया गया । वास्तव में उसी दिन महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र की रणभूमि भी सजने लगी थी ।


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